उन्नत कृषि तकनीक
खेत की तैयारी :
ग्वार की फसल लगभग सभी तरह की भूमि में ली जा सकती है परन्तु क्षारीय तथा जिस भूमि पर पानी ठहरता हो इसके लिए उपयुक्त नहीं है। मई माह में खेत को एक – दो गहरी जुताई कर छोङ देना चाहिये । मानसून की प्रथम वर्षा के साथ एक दो जुताई कर पाटा लगाकर खेत तैयार करना चाहिये । मानसून पूर्व खेत में गोबर की खाद चार पॉच ट्रोली प्रति हेक्टेयर की दर से अच्छी तरह बिछा लें। बुवाई से पूर्व खेत खरपतवार रहित तथा पर्याप्त नमीयुक्त होना चाहिये l
बुवाई :
जुलाई का प्रथम पखवाङा (1 से 15 जुलाई) ग्वार की बुवाई के लिये सही होता है जबकी जल्दी पकने वाली किस्मों के लिये 20 से 30 जून सही समय होता है। 20 जून से पहले बुवाई करने पर पौधे की कायिक बढ़वार तो खूब होती है परन्तु उसमें फलियाँ कम लगती हैं जिससे बीज की उपज कम हो जाती है । 25 जुलाई के बाद बुवाई करने से भी बीज की उपज कम होती है। अतः ग्वार की बिजाई का उपयुक्त समय 01 से 15 जुलाई तक है।
बीजोपचार :
ग्वार की जङों में जो मूलग्रंथियां होती है वे पर्यावरण की नत्र्जन के स्थरीकरण का कार्य-करती है, अथार्त जमीन को नत्र्जन की आपूर्ति करती हैं। इन जड़ ग्रंथियों के अच्छे विकास के लिए बीज को राइजोबियम कल्चर से उपचारित करना चाहिए । इसके लिए 100 ग्राम गुड़ को 1 लीटर पानी में घोल लेवें। घोल ठण्डा होने पर इसमें 600 ग्राम राइजोबियम कल्चर अच्छी तरह से मिला लेवें। इस घोल में 10 किलोग्राम बीज को अच्छी तरह से उपचारित करें ताकि सभी बीजों पर कल्चर की परत चढ जाये। अब बीजों को निकालकर छाया में सुखाकर शीघ्र ही बुवाई कर देवें। फसल को रोग मुक्त रखने हेतु बीज को ट्राईकोडर्मा 4 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से भी उपचारित करना चाहिये l
बीज दर :
ग्वार की अकेली फसल हेतु 12 से 15 किलो उन्नत किस्म का बीज प्रति हेक्टेयर की दर से बुवाई करें। ग्वार की बुवाई कतार या पंक्ति में करें। कतार से कतार की दूरी 30 से 45 से.मी. रखें तथा पौधे से पौधे की दूरी 10 से 15 से.मी. रखें।
उर्वरक प्रबंधन :
दलहनी फसल होने के कारण ग्वार को नत्र्जन की विशेष आवश्यकता नहीं होती है। फास्फोरस की 40 किलोग्राम प्रति हैक्टेयर मात्रा, ग्वार के लिये लाभदायक होती है जो की बुवाई के साथ ही दे देनी चाहिये । फास्फोरस की आपूर्ति सिंगल सुपर फास्फेट से करने से पौधों को गंधक की आपूर्ति भी हो जाती है। बुवाई से लगभग 15 दिन पूर्व गोबर अच्छी सड़ी हुई खाद 10 से 15 टन प्रति हैक्टर की दर से खेत में मिलानी चाहिये l खेत में गोबर की खाद मिलाने से मृदा की जल ग्रहण क्षमता बढ़ती है एवं पौधों को बढ़वार के लिये पोषक तत्व भी प्राप्त होते हैं l ग्वार दलहनी फसल होने के कारण इसकी जड़ो में जड़ ग्रंथियां पाई जाती हैं, जो वातावरण से नाइट्रोजन का स्थिरीकरण करती है और मृदा की भौतिक दशा को सुधारने के साथ-साथ अन्य फसलों की उपज में वृद्धि करती है l
जल प्रबंधन :
आमतौर पर ग्वार की खेती वर्षा आधारित शुष्क व अर्ध शुष्क क्षेत्रों में की जाती है l लेकिन यदि सिंचाई की सुविधा उपलब्ध है तो फसल को पानी की कमी होने पर सिंचाई अवश्य करनी चाहिये l मुख्यतः फूल आने पर एवं बीज बनने की अवस्था पर जीवन रक्षक सिंचाई अवश्य करनी चाहिये l बीज बनने के समय ज्यादा तापमान एवं निम्न आर्द्रता होने से फसल की उपज पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है l वर्षा आधारित क्षेत्रों में खेतों की मेढ़ बंदी कर वर्षा जल का संरक्षण किया जाना चाहिये l बुवाई के 25 व 45 दिन बाद थायोयूरिया के 0.1 प्रतिशत घोल का छिड़काव करने से फसल में जल कि कमी को सहने की क्षमता बढ़ती है l
निराई गुड़ाई :
बुवाई के 25 से 30 दिन बाद पहली निराई गुड़ाई करनी चाहिये । दूसरी निराई गुड़ाई यदि आवश्यकता हो तो 40 से 45 दिन पश्चात करनी चाहिये। समय पर निराई गुड़ाई करने से खरपतवार तो समाप्त होती ही है साथ ही भूमि में हवा का प्रवाह भी अच्छा होता हैं।
पौध व्याधि एवं कीट प्रबन्धन :
ग्वार की फसल अन्य फसलों की तुलना में व्याधियों एवं कीटों के प्रकोप में कम आती है। फिर भी कुछ बिमारियाँ एवं कीट अनुकूल मौसम होने पर इसे प्रभावित करते हैं । ग्वार की प्रमुख बिमारियाँ जीवाणु पर्ण अंगमारी, अल्टरनेरिया लीफ स्पॉट, जङ गलन व चूर्णिल आसिता हैं जो की फसल को आर्थिक रूप से हानि पहुँचाती हैं। जीवाणु पर्ण अंगमारी खेत में फैलने पर फसल को 50-60 प्रतिशत तक नुकसान पहुँचा सकती हैं। बिमारियों के प्रकोप से बचने हेतु निम्न बचाव करने चाहिये
1। रोग प्रतिरोधी किस्म का प्रयोग करना चाहिए ।
2। उचित फसल चक्र अपनाना चाहिये ।
3। समय समय पर खरपतवार निकालना ।
4। मई माह में खेत की गहरी जुताई कर छोङ देना चाहिये।
खङी फसल मे बीमारी का प्रकोप होने की स्थिति में निम्न उपचार करने चाहिये।
1। पौधे के रोगग्रस्त भागों को तोड़ कर जला देना चाहिये।
2। ज्यादा संक्रमित पौधों को उखाड़ कर जला देना चाहिये।
ऐसे खेत जहाँ कीट बिमारियों की संभावना ज्यादा रहती है उनमें बुवाई से पहले खेत तैयार करते समय नीम की खल (नीम केक) को अच्छी तरह कूट पीस कर खेत में मिलाने से खेत में कीटों व बिमारियों के बीजाणु नष्ट हो जाते हैं।
ग्वार में कीटों का प्रकोप भी कम होता हैं, परन्तु तैलिया (जैसिड) कभी कभी कुछ स्थानों पर फसल को नुकसान करता है। इसके बचाव के लिये ग्वार की जल्दी पकने वाली किस्में उपयुक्त रहती हैं साथ ही ज्यादा प्रकोप की स्थिति में किसी भी नीम आधारित कीटनाशक (निम्बीसिडिन) से उपचार करना चाहिये।
रासायनिक कीटनाशकों का प्रयोग ग्वार की फसल में नहीं करने से हमारे उत्पाद (ग्वार गम ) की गुणर्वता अच्छी होती है l चूँकि ग्वार की फसल मुख्य रूप से बीज के लिये उगाई जाती है जिससे ग्वार गम बनता है जो कि विदेशों में निर्यात किया जाता है। ग्वार गम का प्रमुख उपयोग खाद्य पदार्थों में होता है। खाद्य पदार्थों में रासायनिक कीटनाशकों के अवशेष रह जाने पर मानव शरीर को नुकसान पहुँचा सकते हैं l अतः ग्वार की फसल में एंव कटाई पश्चात रासायनिक कीटनाशकों का प्रयोग जहाँ तक सम्भव हो सके नहीं करना चाहिये ताकि हमारा उत्पाद आन्तरराष्ट्रीय स्तर की गुणवता वाला हो सके।
कटाई :
जल्दी पकने वाली किस्में लगभग 90 दिन में पक जाती हैं जबकि अन्य किस्में 110 से 125 दिन में पक जाती हैं । सामान्यतः जब पौधे की पत्तियाँ सूखकर गिरने लगे तथा फलियाँ भी सूखकर भूरे रंग की होने लगे, तब फसल की कटाई कर देनी चाहिये। गहाई (थ्रेशिंग) के लिये फसल को धूप में अच्छी तरह सुखा लेना चाहिये एवं उसके बाद श्रमिकों या थ्रेशर मशीन से थ्रेशिंग कर लेनी चाहिये।
इस तरह उन्नत कृषि तकनीक अपनाकर ग्वार की फसल से अधिक से अधिक लाभ कमाया जा सकता है।
