
परिचय
किसान भईयो भारत में ज्वार मुख्य रूप से कर्नाटक, महाराष्ट्र, आंध्राप्रदेश, तमिलनाडु, मध्य प्रदेश, गुजरात, राजस्थान एवम उत्तर प्रदेश में उगाई जाती हैI उत्तर प्रदेश में ज्वार की खेती मुख्यतः झांसी, हमीरपुर, जालौन, बाँदा, फतेहपुर, इलाहाबाद, फरुखाबाद, मथुरा एवम हरदोई जनपदों में की जाती हैI ज्यादातर शुष्क क्षेत्रों में इसकी खेती की जाती हैI इसके साथ ही जहाँ पर औसतन कम वर्षा होती है वहां पर ज्वार की खेती अच्छी तरह से की जाती हैI
जलवायु और भूमि
ज्वार की खेती शुष्क जलवायु अर्थात कम वर्षा वाले क्षेत्रों में सफलतापूर्वक की जा सकती हैI इसके लिए हल्की या बलुई दोमट मिट्टी उपयुक्त होती है इसके साथ ही साथ बुंदेलखंड जैसी काली मिट्टी में भी की जा सकती हैI मध्य भारी तथा ढालू भूमि में भी इसकी खेती की जा सकती है साथ ही जल निकास अच्छा होना चाहिएI
खेत की तैयारी
पहली जुताई मिटटी पलटने वाले हल से तथा दो-तीन जुताई देशी हल या कल्टीवेटर से करने के बाद खेत को भुरभुरा बना लेना चाहिए आख़िरी जुताई में 100 से 125 कुंतल सड़ी गोबर की खाद को खेत में तैयारी करते समय ही अच्छी तरह से मिला देना चाहिएI
बीज बुवाई
बीज की मात्रा जैसे की संकुल प्रजातियों में 10 से 12 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर, संकर प्रजातियों में 7 से 8 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर बुवाई में इसका बीज लगता हैI यदि बीज उपचारित नहीं है तो बुवाई से पहले एक किलोग्राम बीज को 2.5 ग्राम थीरम से शोधित कर लेना चाहिए जिससे की जमाव अच्छा हो सके साथ ही कंडवा रोग न लग सकेI
पोषण प्रबंधन
100 से 125 कुंतल गोबर की खाद खेत की तैयारी करते समय आख़िरी जुताई में मिलाना चाहिएI उर्वरको का प्रयोग भूमि परीक्षण के आधार पर करना चाहिएI यदि भूमि परीक्षण नहीं कराया गया है तो संकर प्रजातियो के लिए उत्तम उपज हेतु 80 किलोग्राम नत्रजन, 40 किलोग्राम फास्फोरस, 20 किलोग्राम पोटाश तथा अन्य प्रजातियों हेतु 40 किलोग्राम नत्रजन, 20 किलोग्राम फास्फोरस एवम 20 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर प्रयोग करना चाहिएI त्रजन की आधी फास्फोरस एवम पोटाश की पूरी मात्रा खेत में बुवाई के समय कूड़ो में बीज के नीच डालना चाहिए नत्रजन की शेष आधी मात्रा बुवाई के लगभग 30-35 दिन बाद खडी फसल में प्रयोग करना चाहिएI
जल प्रबंधन
वर्षा ऋतू की फसल होने के कारण वर्षा का ही पानी पर्याप्त होता है लेकिन वर्षा न होने पर फसल में बाली या भुट्टा निकलते समय और दाना भरते समय यदि खेत में नमी कम हो तो सिंचाई करना अति आवश्यक है या आवश्यकतानुसार एक या दो बार सिंचाई करनी चाहिएI
खरपतवार प्रबंधन
ज्वार की खेती में निराई-गुडाई का अधिक महत्व हैI पहली निराई -गुडाई बुवाई के 15 -20 दिन बाद करनी चाहिएI दूसरी 35 से 40 दिन बाद आवश्यकतानुसार करनी चाहिएI इसी प्रक्रिया में पहले पौधे से पौधे की दूरी भी छटनी के द्वारा निर्धारित कर सकते हैI यदि फसल में पत्थरचट्टा के अलावा अधिक खरपतवार जमते है तो बुवाई के एक या दो दिन के अन्दर लासो 50 ई. सी. इसी को एलाक्लोर भी कहते हैI 5 लीटर प्रति हेक्टेयर भूमि पर छिडकाव करना चाहिए जिससे की खरपतवारों का जमाव ही न हो सकेI
रोग प्रबंधन
ज्वार में ग्रे गोल्ड या ज्वार का भूरा फफूंद एवम सुतरा क्रमी रोग लगते है इनकी रोकथाम के लिए संस्तुति प्रजातियों की बुवाई करनी चाहिए, बीज शोधन करना चाहिए फिर भी मेन्कोजेब 2 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से छिडकाव करना चाहिए इससे रोगों का नियंत्रण किया जा सकता हैI
कीट प्रबंधन
ज्वार में कई कीटों का प्रकोप होता है जैसे की शूट फ्लाई, तना छेदक, इयर हेड मिज, इयर हेड कैटरपिलर, एवम ज्वार का माईट लगते हैI इनकी रोकथाम हेतु बीज शोधन एवम संस्तुत की गयी प्रजातियों की बुवाई करना चाहिएI इसके साथ ही क्यूनालफास 25 ई.सी. 1.50 लीटर प्रति हेक्टेयर का छिडकाव करना चाहिएI डायमेथोएट 30 ई.सी. एक लीटर या क्लोरोपयारिफोस 25 ई.सी. 1.50 से 2 लीटर प्रति हेक्टेयर के हिसाब से छिडकाव करना चाहिएI
फसल कटाई
इसकी कटाई दो प्रकार से की जाती है पहली जब सम्पूर्ण पौधा भुट्टा सहित पककर या सूखकर तैयार हो जाये तब तथा दूसरी भूट्टे या बाले पककर तैयार हो जाये तो पौधे से अलग कर रखना चाहिए कटाई के बाद धुप में अच्छी तरह सुखाकर बैलों से या ट्रेक्टर से दाए या कटाई कर के दाना अलग कर लेना चाहिएI
पैदावार
दो प्रकार की प्रजातियाँ होती है, संकुल प्रजातियाँ एवम संकर प्रजातियाँ संकुल प्रजातियों से पैदावार 30 से 35 कुंतल प्रति हेक्टेयर प्राप्त होती है I तथा संकर प्रजातियों से 35 से 40 कुंतल प्रति हेक्टेयर पैदावार प्राप्त होती हैI
